120 Bahadur Real Story: जब 120 भारतीय जवानों ने 'दादा किशन की जय' बोलकर 3000 चीनियों को रौंद दिया!




क्या आप 120 और 3000 की लड़ाई की कल्पना कर सकते हैं?


गणित (Maths) के हिसाब से यह नामुमकिन है। लेकिन भारतीय सेना के इतिहास में एक ऐसी रात दर्ज है, जब गणित फेल हो गया था और हिम्मत जीत गई थी।

आज हम बात कर रहे हैं फरहान अख्तर की फिल्म '120 Bahadur' की। लेकिन यह सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि रेजांग ला (Rezang La) की वो सच्ची घटना है जिसे सुनकर हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो जाएगा।


मेजर शैतान सिंह और उनके 120 'शेर'

उस रात रेजांग ला की सुरक्षा का जिम्मा 13 कुमाऊं रेजिमेंट की 'चार्ली कंपनी' के कंधों पर था। यह कोई आम टुकड़ी नहीं थी। इसमें हरियाणा और राजस्थान के अहीरवाल क्षेत्र के 120 जांबाज अहीर (Ahir) जवान शामिल थे।

इनकी रगों में यदुवंशियों का खून दौड़ रहा था और इनका नेतृत्व कर रहे थे परमवीर मेजर शैतान सिंह भाटी।

जब दुश्मन ने हमला किया, तो इन वीरों ने अपनी जान की परवाह नहीं की। उन्होंने अपनी राइफलें उठाईं और रेजांग ला की पहाड़ियां उनके युद्ध घोष (War Cry) से गूंज उठीं—

"दादा किशन की जय!"

उस रात, भगवान कृष्ण के ये वंशज मौत को सामने देखकर डरे नहीं, बल्कि उसका स्वागत छाती चौड़ी करके किया।




चीन की सबसे बड़ी गलतफहमी। (China’s Miscalculation)

1962 में चीनी सेना एक बड़े अहंकार में थी। उन्हें लगा कि ये चार्ली कंपनी के भारतीय जवान मैदानी इलाकों (Plains) से आते हैं, इसलिए इन्हें इतने ऊंचे पहाड़ (High Altitude) और कड़कड़ाती ठंड में लड़ने का कोई अनुभव नहीं होगा।

चीनियों ने सोचा था कि वो आसानी से इन मुट्ठी भर जवानों को कुचलकर आगे बढ़ जाएंगे। लेकिन उन्हें अंदाज़ा नहीं था कि वो शेर के मुंह में हाथ डालने जा रहे हैं।


18 नवंबर 1962: कयामत की रात

तापमान था माइनस 25 डिग्री (-25°C)। मेजर शैतान सिंह और उनके जवानों के पास पुरानी '303 राइफल्स' थीं और ठंड से बचने के पर्याप्त कपड़े भी नहीं थे। तभी चीन के 3000 सैनिकों ने आधुनिक हथियारों और तोपों के साथ हमला कर दिया।


"Last Man, Last Round" (आखिरी आदमी, आखिरी गोली)

मेजर शैतान सिंह के पास पीछे हटने का मौका था, लेकिन उन्होंने कसम खाई— "जब तक हम जिंदा हैं, एक भी चीनी यहां से आगे नहीं बढ़ेगा।"

जब गोलियां खत्म हो गईं, तो हमारे जवान खाली हाथ और संगीनों (बंदूक की नोक पर लगे चाकू) (Bayonets) से भिड़ गए। उन्होंने पत्थरों से दुश्मनों का सिर कुचल दिया।


चीन के अंदर समाया खौफ

चार्ली कंपनी की इस अकल्पनीय बहादुरी ने चीनी सेना की कमर तोड़ दी। उन 120 जवानों ने 1300 से ज्यादा चीनी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया।

इस कत्लेआम ने चीनी कमांडरों के दिल में खौफ पैदा कर दिया। उन्होंने सोचा—

"अगर बिना सही हथियार के सिर्फ 120 भारतीय जवान हमारा ये हाल कर सकते हैं, तो आगे खड़ी पूरी भारतीय सेना की बड़ी यूनिट हमारा क्या हश्र करेगी?"

यही वो डर था जिसने दुश्मन के कदमों को रोक दिया।


वो एक सिपाही और "अधूरी" सच्चाई

इस जंग का सबसे दर्दनाक पहलू यह था कि 120 में से सिर्फ 6 जवान जिंदा बचे थे। बचे हुए 6 में से 5 जवानों को घायल अवस्था में चीनी सेना ने बंदी (POW) बना लिया था। मेजर शैतान सिंह बुरी तरह घायल हो चुके थे। अपनी आखिरी सांसों में उन्होंने अपने एकमात्र बचें हुए साथी रेडियो ऑपरेटर रामचंद्र यादव को एक आदेश दिया—

"तुम यहां से वापस जाओ। अगर हम सब मारे गए, तो दुनिया को कौन बताएगा कि रेजांग ला पर हमने कैसे लड़ाई लड़ी? जाओ और सच्चाई बताओ।"


जब किसी ने यकीन नहीं किया...

जब रामचंद्र यादव (जो एक सिग्नलमैन थे) पहाड़ी से नीचे उतरकर हेडक्वार्टर पहुंचे, तो वो बुरी तरह घायल और सदमे में थे।

• उन्होंने बताया कि "हमने 1000 से ज्यादा चीनी मार गिराए हैं।"

• सेना के अधिकारियों को लगा कि यह जवान युद्ध के सदमे (Trauma/Shell Shock) में है। उन्हें लगा कि मानसिक संतुलन बिगड़ने की वजह से यह ऐसी "बढ़ा-चढ़ाकर" बातें कर रहा है।

• अधिकारियों का तर्क था कि 303 की पुरानी राइफलों और बिना तोपखाने (Artillery) की मदद के 120 जवान इतनी बड़ी चीनी फौज का इतना नुकसान कर ही नहीं सकते।

• इसलिए, उनकी बातों को एक "पागलपन" या "हड़बड़ाहट" माना गया और फाइल ठंडे बस्ते में चली गई।


कुदरत का खेल: बर्फबारी (The Weather)

18 नवंबर को लड़ाई हुई और उसके तुरंत बाद रेजांग ला पर भयानक बर्फबारी (Heavy Snowfall) शुरू हो गई।

• लद्दाख की ठंड में वहां 5-10 फीट बर्फ जम गई।

• मेजर शैतान सिंह और बाकी 113 जवानों के पार्थिव शरीर उस बर्फ की मोटी चादर के नीचे दब गए।

• रास्ते पूरी तरह बंद हो चुके थे। उस ऊंचाई (16,000+ फीट) पर जाना अगले 3 महीनों तक नामुमकिन हो गया था।

• साथ ही, युद्धविराम (Ceasefire) के बाद वह इलाका एक तरह का "No Man's Land" बन गया था, जहां तुरंत गश्त (Patrolling) नहीं हो रही थी।


सच कैसे सामने आया? (फरवरी 1963)

फरवरी 1963 में जब थोड़ी धूप निकली और बर्फ पिघलनी शुरू हुई, तो लद्दाख का एक गड़रिया (Shepherd) वहां अपनी भेड़ें चराने गया।

उसने देखा कि बर्फ के नीचे से कुछ हेलमेट और बंदूकें झांक रही हैं। वह डर गया और भागकर भारतीय सेना की चौकी पर खबर दी।

जब सेना और रेड क्रॉस की टीम वहां पहुंची, तो उन्होंने जो देखा, उसने रामचंद्र यादव की एक-एक बात को सच साबित कर दिया:

• जवान अपनी पोजीशन पर जमे हुए थे (गोली चलाते हुए)।

• कइयों के हाथ में ग्रेनेड थे (पिन निकली हुई)।

• मेडिक (नर्सिंग असिस्टेंट) के हाथ में पट्टी थी (इलाज करते हुए मौत)।

• और वहां चीनी सैनिकों के खून के धब्बे और निशान बता रहे थे कि वहां कितना बड़ा कत्लेआम हुआ था।

हर भारतीय जवान के पास दुश्मनों की लाशों के ढेर थे। सबसे रोंगटे खड़े करने वाला दृश्य मेजर शैतान सिंह का था। उनका शरीर बर्फ में एक चट्टान के सहारे जमा हुआ था, लेकिन उनकी मशीनगन का मुंह अभी भी चीन की तरफ था।

ऐसा लग रहा था मानो वो आज भी चीन को आंखें दिखाकर ललकार रहे हों। वो दृश्य चीख-चीख कर बता रहा था कि मेजर शैतान सिंह और उनके अहीर शेर भारत माता की रक्षा के लिए अपनी जान हथेली पर लेकर रेजांग ला की धरती पर अपनी अंतिम साँस और लहू की आख़िरी बूंद बहने तक लड़े थे।


चीन की प्रतिक्रिया


चीन ने कभी आंकड़ों में अपनी हार नहीं मानी, लेकिन जब उन्होंने मेजर शैतान सिंह के पार्थिव शरीर पर अपनी ही सेना का कंबल ओढ़ाया, तो वह उस 120 वीरों की टोली के आगे नतमस्तक होने का उनका तरीका था।

  • उनकी राइफलों की संगीनें (Bayonets) निकालकर उनके शवों के पास जमीन में गाड़ दी गई थीं, जो कि फौज में एक बहादुर दुश्मन को सम्मान देने का तरीका होता है।

बाद के सालों में, कुछ अनौपचारिक (Unofficial) चीनी मिलिट्री फोरम और लेखों में इस लड़ाई को "Battle of Bangongluo" (Pangong Lake Battle) कहा गया है। वहां दबी जुबान में यह माना गया है कि पश्चिमी सेक्टर में यह उनके लिए सबसे खूनी और कठिन लड़ाई थी।


एक ऐतिहासिक सच: वो गाना और वो गुस्सा

क्या आप जानते हैं कि लता मंगेशकर जी का अमर गीत "ऐ मेरे वतन के लोगों" खास तौर पर इन्हीं शहीदों की याद में लिखा गया था?

27 जनवरी 1963 को जब दिल्ली के रामलीला मैदान में लता जी ने यह गीत गाया, तो वहां मौजूद हर शख्स और पूरे भारत की आंखों में आंसू आ गए थे।

यह आंसू सिर्फ दुख के नहीं, बल्कि उस गुस्से के भी थे कि 1962 की हार का सबसे बड़ा कारण राजनैतिक विफलता (Political Failure) और सरकार की गलतियां थीं।

हमारे जवानों के पास न जूते थे, न गर्म कपड़े और न ही सही हथियार। सरकार की इन गलतियों की सजा हमारे वीरों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।


2020 में लिया बदला: अमर हो गए वो 120 अहीर!

इतिहास गवाह है कि भारतीय सेना कभी नहीं भूलती। 1962 के उस दर्द का हिसाब 2020 में चुकता किया गया, जब भारतीय सेना ने 'ऑपरेशन स्नो लेपर्ड' (Operation Snow Leopard) चलाकर उन चोटियों पर दोबारा तिरंगा लहराया।

आज वहां एक भव्य 'रेजांग ला वॉर मेमोरियल' (Rezang La War Memorial) बना हुआ है। वहां मेजर शैतान सिंह भाटी की एक विशाल प्रतिमा (Statue) स्थापित की गई है।

उस प्रतिमा को देखकर ऐसा महसूस होता है मानो मेजर साहब आज भी अपने 120 अहीर जवानों के साथ भारत माता की रक्षा के लिए तत्पर खड़े हैं।



फिल्म कैसी है? (Movie Verdict)

फरहान अख्तर ने मेजर शैतान सिंह के किरदार में जान डाल दी है। यह फिल्म आपको रुलाएगी भी और जोश से भर देगी। अगर आप एक सच्चे भारतीय हैं, तो यह फिल्म मिस न करें।

🎬 Rating & Details

• My Rating: ⭐⭐⭐⭐⭐ (5/5)

• IMDb Rating: 8.8/10

• Where to Watch:

https://app.primevideo.com/detail?gti=amzn1.dv.gti.e92c5254-ef54-48bd-9bb2-bd951d9a279b&territory=IN&ref_=share_ios_movie&r=web

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